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Thursday, 17 January 2013

सुनो मित्रवर…!

 
मेरी बेवजह की बातों से तुम बोर तो न होगे
मेरी उलूल जुलूल लेखनी तुम्हें चुभेगी तो नहीं
बिना विकल्प वाली बाते तुम्हें छ्लावा तो न लगेगा
अजुरी भर धूप, एक चम्मच गर्मी कम तो न पड़ेंगे
लोग जब विस्मय से घूरेंगे तो तुम डर तो न जाओगे
मुझ जैसे जिन्दा शव के साथ जीने की चाह कर पाओगे क्या?
मेरे अर्थहीन शब्द तुम्हारे कानों को रास आयेंगे क्या?

क्या सच में हम निर्रथक एक पल भी जी सकते हैं…?
तुम खूबशूरत सपनों के चादर पर प्यार की कड़ाई चाहते हो
मगर मेरा बसेरा तो हक़ीकत के मकड़ जाल के बिचो बीच है
मैं 'गौरा' हूँ ! जिसके कोमल, हिमवती, सरल व्यकत्तिव में
वास करता है रौद्र रूपी,  दहकती आँखों वाला महायोगी

क्या तुम ’शिव’ बन पाओगे ! नाम के नहीं चरित्र के, नहीं न?
तुम मुझे दया-पात्र न बनाओ निर्मोही !
अपनी खुदी खुद खोजो..!